Friday, 27 May 2016

वो लड़कियों के कपड़े सूखते देखकर किराए का कमरा लेते थे


कुटिया पर मुझे साढ़े सात बजे तक पहुंच जाना था और सात बज गए थे. एक तो मेरी जेब में रिक्शे-भर के लिए मुद्रा नहीं थी, दूसरे आज इस जाड़े की पहली बारिश हुई थी और इस समय रात के सात बजे तेज़ हवा थी. जाड़े में ठंडी के अनुपात में हमारा शरीर सिकुड़ जाता है और चाल धीमी हो जाती है, तो धीमी गति से कुटिया पर साढ़े सात बजे कैसे पहुंचा जा सकता था. मैंने मफ़लर से कानों के साथ-साथ समूचे सिर को ढंक लिया. गर्दन पर लाकर दोनों किनारों की गांठ लगाई. अब मैं अपनी समझ से सर्दी से महफूज कुटिया तक पहुंच सकता था. मफ़लर के भीतर से मेरी आंखें और नाक झलक रही होंगी.
कुटिया में आज हम दोस्तों का सामूहिक विदाई समारोह था. कहने को तो हम बड़े दिन की छुट्टियों में घर आ रहे थे, पर इस बार का जाना साधारण प्रस्थान नहीं था. इस बार हमारे गमन में उत्साह नहीं, मजबूरी थी. घरों से मनीऑर्डर आने की अवधि बढ़ती जा रही थी और हम किसी भी कम्पटीशन में उत्तीर्ण नहीं हो रहे थे. हमने कुछ अख़बारों के दफ्तरों और रेडियो स्टेशन में चक्कर मारे. पहली बात तो वहां काम का टोटा था, गर काम था तो क्षणजीवी किस्म का. उसमें भी श्रम ज़्यादा और धन कम का सिद्धान्त सर्वमान्य था. सबसे पहले रघुराज ने घोषणा की, ”मैं घर चला जाऊंगा. इलाहाबाद में मेरा पेट भी नहीं भर पाता है.”
कृष्णमणि त्रिपाठी ने गम्भीरता का नाटक करते हुए कहा, ‘सब्र करो और ईश्वर पर भरोसा रखो. ऊपरवाला जिसका मुंह चीरता है, उसे रोटी भी देता है.’
हम हंस पड़े. कृष्णमणि की यह पुरानी आदत थी. वह नास्तिक था और ईश्वर की बात करके वह ईश्वर का मज़ाक उड़ाता था. उसका चेहरा मुलायम था और हाथों पर बड़े-बड़े घने बाल थे.
यह प्रारम्भ था. बाद में एक दिन हुआ यह कि फ़ैसला हो गया, हम अपने-अपने घरों को चले जाएंगे.
विनोद ने कहा था, ”हम इस तरह नहीं जाएंगे. हम एक दिन जाएंगे और जाने के एक दिन पहले मेरे कमरे पर बैठक होगी और उसमें मैं शराब सर्व करूंगा.”
विनोद ने अपने कमरे का नाम कुटिया रखा था. मैं विनोद के कमरे पर जा रहा था. कुटिया जा रहा था, जहां पर मेरे बाकी दोस्त मिलेंगे. वे भी कल मेरी तरह इस शहर को छोड़ देंगे.
आगे की कहानी संक्षिप्त, सुखहीन और मंथर है, इसलिए मैं थोड़ा पहले की कहानी बताना चाहूंगा. उसमें उन्मुक्त विस्तार, प्रसन्नता और गति है. तो आखि़र चीज़ें इतनी उलट-पुलट क्यों हो गईं, यह रहस्य मैं इस उन्मुक्त, प्रसन्नता और गति से भरे हिस्से के बाद, यानी अभी-अभी जहां पर कहानी ठहरी थी, उसके बाद के अंश में खोलूंगा.
विनोद से मेरी पहली मुलाक़ात एक गोष्ठी में हुई थी. उसमें उसने कविताएं पढ़ीं, जिनकी मैंने जमकर धुनाई की. सचमुच उस गोष्ठी में उसकी कविताएं रुई थीं और मैं धुनिया. बस, उस गोष्ठी के बाद विनोद मेरा दोस्त बन गया. हमारी गाढ़ी छनने लगी. हमारी जो कुछ लोगों की मंडली थी, उसमें सिफ़ारिश करके मैंने उसका दाखिला करा दिया. उधर उसका दाखिला हुआ था और इधर मेरा मकान-मालिक सात महीनों का बकाया किराया मांगने पर हरामीपन की हद तक उतर आया. एक बार मैंने मज़ाक में मामला रफ़ा-दफ़ा करने की गरज से कहा, ”नौ महीने हो जाने दीजिए. सात महीने में जच्चा-बच्चा दोनों को ख़तरा रहता है.” सुनकर मकान-मालिक ने पिच्च से थूक दिया. पान की पीक ने मेरी वाक्पटुता की रेड़ मार दी थी. आखि़रकार मैंने पाया कि इस मामले में सात महीने का मुफ्त निवास भी उपलब्धि है. मंडली में कमरा तलाश करने की बात चलाई. अगले दिन सभी कमरे की खोज में सक्रिय हो गए. नवागंतुक विनोद भी इस काम में जोत दिया गया था.
कमरे के मामले में मकान-मालिक सिद्धान्तवादी होते हैं. उन्होंने कुछ सिद्धान्त बना रखे थे, जैसे शादीशुदा लोगों को ही किराएदार बनाएंगे. नौकरीवालों को वरीयता देंगे. नौकरी स्थानान्तरणवाली हो. कुछ लोग गोश्त-मछली खाने पर पाबन्दी लगाते, तो कुछ रात में देर से आने पर. वगैरह.वगैरह!
मैं इन सभी मानदंडों पर अयोग्य था, फिर भी छल-प्रपंच कर कमरा प्राप्त ही कर लेता. दरअसल हम भी कोई ऐरे-गैरे नहीं थे. मेरा और मेरी मंडली का भी एक सिद्धान्त था कमरे को लेकर. कमरा उसी मकान में लिया जाएगा जिसमें और जिसके आसपास नैसर्गिक सौन्दर्य हो, यानी कि सुन्दरियां हों. इस बात की जानकारी हेतु हमारे पास उपाय था. हम पान और चाय की दुकानों पर गौर करते, जहां मुस्टंडों का जमावड़ा होता, उसके आसपास कमरा पाने के लिए जद्दोजहद करते. कमरा न मिले, यह दीगर बात है, किन्तु हमारे प्रयोग की प्रामाणिकता कभी भी सन्देहवती नहीं हो पाई थी. वाकई वहां सुन्दरियां होतीं. चाय-पान की दुकानों के अलावा एक और दिशासूचक था हमारे पास पड़ताल का. हम मकान के छज्जों और छतों पर दृष्टिपात करते. यदि शलवार, कुर्ते, दुपट्टे या अन्तरंग वस्त्र लटकते होते, तो हम वहां बातचीत करना मुनासिब समझते.
विनोद इस प्रसंग में कुछ ज़्यादा ही मुद्दहर निकला. नैसर्गिक सौन्दर्य या नैसर्गिक सौन्दर्य के वस्त्र देखता, तो पहुंच जाता और पूछता, ”मकान खाली है क्या?” ‘नहीं’ सुनने के बाद वह प्रश्न करने लगता कि बताया जाए आसपास में कोई मकान खाली है? खैर, काफ़ी छानबीन के बाद एक कमरा मिला. बातचीत के पहले हमने छज्जे पर कुंवारे कपड़े देखे और छत पर तीन नैसर्गिक सौन्दर्य.
मकान-मालिक को तुरन्त एडवांस दिया और पहली तारीख़ से रहने की बात पक्की कर ली. जब हम कमरे में आए तो यह जि़न्दगी का बहुत बड़ा घोटाला साबित हुआ था. मंडली के प्रत्येक सदस्य का चेहरा गमगीन हो गया था. वे तीनों सौन्दर्य विभूतियां रिश्तेदार थीं जो मंडली में बेवफ़ाई करके घर चली गई थीं. रघुराज ने कहा, ”सालियों के शलवार, कुर्ते और दुपट्टे अब कहीं टंगते होंगे और युवा पीढ़ी को दिशाभ्रमित करते होंगे.” प्रदीप ने दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा, ”सब माया है.” और कमरे में कोरस शुरू हो गया:
माया महा ठगिनी हम जानी.
तिरगुन फांस लिए कर डोलें
बोलै मधुरी बानी.
केशव के कमला है बैठी शिव के भवन भवानी.
पंडा के मूरति होई. बैठी तीरथ में भई पानी.
योगी के योगिन है बैठी राजा के घर रानी.
काहू के हीरा है बैठी काहू के कौड़ी कानी.
भक्त के भक्तिन है बैठी ब्रह्मा के ब्रह्मानी.
कहै कबीर सुनो हो सन्तो वह अब अकथ कहानी.
माया महा ठगिनी हम जानी.
मंडली में कई लोग थे–प्रदीप, रघुराज, कृष्णमणि त्रिपाठी, विनोद, दीनानाथ, त्रिलोकी, मदन मिश्रा आदि. हम विश्वविद्यालय के बेहद पढ़े-लिखे लड़कों में थे. हमारी पढ़ाई-लिखाई वह नहीं थी, जो गुरुओं के पाजामे का नाड़ा खोलने से आती है. हम उस तरह के पढ़नेवाले भी नहीं थे, जो प्रकट हो जानेवाले ग्रस्त रोगी की तरह अपने बाड़े में ही दुबके रहते हैं. ऐसों को प्राय: हम डंडा करते थे. राजनीतिक रुझान भी थी हमारी.
हम लोग लड़कियों के दीवाने थे. कोई हमारी आन्तरिक बातें सुनता तो हमें लम्पट और लुच्चा मान लेता. मगर हम ऐसे गिरे हुए नहीं थे. लड़कियों के प्रति यह आसक्ति वास्तव में जिज्ञासा और खेल थी. सीमा का अतिक्रमण हराम था हमारे लिए. सच कहूं, हम इतने नैतिक थे कि अवसर को ठुकरा देते थे. वैसे तो हम लोगों की तरफ़ अनेक लड़कियां लपकती थीं. हम अपने-अपने विभाग के हीरो थे. यह भी बता दूं कि चिकने-चुपड़े गालों, सफाचट मूंछों और दौलत की वजह से हीरो नहीं थे; बल्कि हममें से अधिसंख्य तो दाढ़ी भी रखते थे. जहां तक दौलत का प्रश्न है, तो हम लड़कियों से प्राय: चन्दा मांगते थे. इस राह पर त्रिलोकी दो डग आगे था. वह व्यक्तिगत कामों के लिए भी लड़कियों से चन्दा वसूलता. लेकिन वह उन नेताओं की तरह नहीं था जो सामूहिक कल्याण के लिए चन्दा लेकर अपने तेल-फुलेल पर ख़र्च करते हैं. त्रिलोकी को जब निजी काम के लिए ज़रूरत होती, तो ज़रूरत बतलाकर पैसा लेता. वह कहता, ”विभा, भोजन के लिए पैसा नहीं है, लाओ, निकालो.”
एक बार एक लड़की ने त्रिलोकी से पूछा, ”तुम हम लड़कियों से ही क्यों हमेशा चन्दा मांगते हो?” ”क्योंकि वे दयालु होती हैं. लड़के घाघ और क्रूर होते हैं.”
त्रिलोकी की इस स्थिति की वजह उसकी एक ख़राब आदत थी. घर से जब उसका मनीऑर्डर आता तो वह सनक जाता. रिक्शा के नीचे उसके पांव नहीं उतरते थे. दोस्तों के साथ नानवेज खाता और सिनेमा देखता. एक-दो बार जन-कल्याण भी करता. जन-कल्याण मंडली में शराब का कोड था और देशभक्ति प्यार-मुहब्बत का. हां, तो हफ्ते-भर में त्रिलोकी के पैसे चुक जाते और वह सड़क पर आ जाता.
कमोबेश मंडली के हर सदस्य की स्थिति यही थी. हमारी त्रासदी थी कि हम सुखमय जीवन जीने की कामना रखते थे किन्तु हमारे मनीऑर्डर वानप्रस्थ पहुंचानेवाले थे. यह दीगर बात है कि सब लोग त्रिलोकी की तरह महीने के पहले हफ्ते में ही कंगाल नहीं होते थे, लेकिन महीने के अन्त में भोजन को लेकर तीन तिकड़म करना सभी की बाध्यता थी. कृष्णमणि होटल में रजिस्टर देखता. जितने मीटिंग गेस्ट लिखा होता, उससे दो गुना मीटिंग वह अपने एक रिश्तेदार के यहां खाकर सन्तुलन स्थापित करता. मदन मिश्र प्राय: कमरे में खिचड़ी पकाकर मेस में एब्सेंट लगवाता. रघुराज भूखा रहकर भी हंसते रहने की क्षमता अर्जित कर चुका था. प्रदीप जिसमें ऐसी कोई योग्यता नहीं थी, लोगों के यहां घूम-घूमकर खाता. पंकज सक्सेना शर्मीला था, सो मंडली ने विनोद को समझा दिया था, वह उसका सत्कार करता. विनोद फले-फूले परिचितों से सम्मानजनक रकम  क़र्ज़ लेता था, जिसे कभी नहीं चुकाता था.
छुट्टियों के बाद यूनिवर्सिटी खुली थी, इसलिए लोगों के चेहरों पर एक ख़ास तरह का नयापन और उल्लास था. पर ये चीज़ें उतनी नहीं थीं, जितनी इस मौके पर होनी चाहिए थीं. क्योंकि कल इस जाड़े की पहली बारिश हुई और आज हवा तेज़ चल रही थी, इसलिए लोग ठंड से सिकुड़े हुए थे.
मैं कुछ ज़्यादा ही पहले अपने हिन्दी विभाग आ गया था, इसलिए सामने के लॉन में खड़ा धूप खा रहा था. मुझे त्रिपाठी का इन्तज़ार था कि वह आए तो चलकर चाय पी जाए. मोहन अग्रवाल साले का पीरियड कौन अटेंड करे.
मैं सदानन्दजी के अलावा और किसी का पीरियड अटेंड नहीं करता था क्योंकि बाकी अध्यापक पढ़ाई के नाम पर कथावाचन करते थे या खुद सही किताब से नकल करके इमला लिखवाते थे. एम.ए. में नकल का इमला. मैंने इनकी कक्षाओं का बायकाट कर दिया पर मेरे इस कुकर्म पर वे भन्नाने की जगह परम प्रसन्न हो
गए. क्योंकि अब वे क्लास में निर्भीक भाव से लघुशंका-दीर्घशंका समाधान करसकते थे.
मुझे त्रिपाठी पर झुंझलाहट हुई, आ क्यों नहीं रहा है. कहीं डूब गया होगा बतरस में. त्रिलोकी को बोलने का भयानक चस्का था. उसके बारे में प्रसिद्ध था कि त्रिलोकी जब बोलना शुरू करता है तो सामनेवाला केवल कान होता है और वह केवल मुंह.
मेरे विभाग में उसके आने का एक उद्देश्य सुन्दरियों को देखना भी होता था. यहां एम.ए. के दोनों भागों में लड़कियों की तादाद लड़कों से ज़्यादा होती थी, इसलिए यह विभाग अन्य छात्रों का तीर्थ होता था. यहां लोग विपरीत सेक्स के चक्कर में इस तरह मंडराते, जैसे अस्पताल और मन्दिरों के आसपा मंडराते हैं. वैसे यह विश्वविद्यालय का मीरगंज बोला जाता था. मीरगंज इलाहाबाद का वह स्थल है, जहां नैतिकतावादी लोग बहुत सतर्क होकर घुसते और टिकते हैं और बाहर निकलते हैं. तभी सदानन्दजी का स्कूटर रुका और वह अपना हैलमेट हाथ में झुलाते हुए आने लगे. हमारी मंडली उनका बेहद सम्मान करती थी लेकिन उनसे हमारे सम्बन्ध बेतकल्लुफ़ थे.
एक बार हमने उनसे शराब के लिए रुपए भी लिए थे. वह अपनी मेधा और वामपंथी रुझान के अतिरिक्त एक अन्य प्रकरण की वजह से भी चर्चित थे. उन्होंने प्रेम-विवाह किया था किन्तु विभाग की अध्यापिका सुनीता निगम से प्रेम करते थे. दोनों दुस्साहसी थे और भरे विभाग में एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेते थे. कई लोगों ने उन्हें सिविलाइंस के एक अच्छे रेस्तरां में देखा-सुना था. गुरु के बारे में ज़्यादा क्या कहा जाए, समझदार के लिए इशारा काफ़ी है. मतलब यह कि विवाह न करने के बावजूद दोनों दम्पती थे.
सदानन्दजी मुझे देखकर मुस्कुराए और पास आकर मेरी अभी हाल में छपी एक कविता की तारीफ़ करने लगे. मैंने सोचा, इस तारीफ़ को कोई सुन्दरी सुनती तो आनन्द था. तभी एम. ए. प्रीवियस की नई किन्तु सुन्दर लड़की उपमा श्रीवास्तव दिखी. हम दोनों का हलका-हलका चक्कर भी चल रहा था. मैं उसे बुलाकर सदानन्दजी से परिचय कराने लगा. परिचय के बाद मैंने कहा, ”हां, तो सर, मेरी उस कविता में कोई कमी हो तो वह भी कहें, तारीफ़ तो आपने बहुत कर दी.”
वह मुस्कुराकर बोले, ”नहीं भई, यह तुम्हारी बहुत अच्छी कविता है.”
”सर, प्रणाम!”
त्रिलोकी आ गया था. आज हम चार लोग धूप के एक वृत्त में खड़े थे. तभी विभागाध्यक्ष महेश प्रसाद, जिन्हें मंडली गोबर-गणेशजी कहती थी, लपड़-झपड़ आते दिखाई पड़े. उन्हें देखकर उपमा थोड़ी दूर खिसककर खड़ी हो गई. कई दूसरे लोगों ने भी अपनी पोज़ीशन बदल ली, क्योंकि सदानन्दजी और गोबर-गणेशजी में दांतकाटी दुश्मनी थी. गोबर-गणेशजी हिन्दी विभाग का अध्यक्ष होने के नाते अपने को साहित्यकार लगाते थे, पर साहित्य में मान्यता सदानन्दजी की थी. इसके अतिरिक्त गणेशजी प्रो. वी.सी. लॉबी में थे जबकि सदानन्दजी एंटी वी.सी. लॉबी में थे.
और सबसे ख़ास बात, इस विश्वविद्यालय के अध्यापकों में ब्राह्मण और कायस्थ जाति के लोग शक्तिशाली थे जबकि सदानन्दजी सिंह थे. इस मामले में भी गणेशजी का कहना था कि असल में वह सिंह नहीं, यादव थे. सदानन्द मथुरा के नन्द कुलवंशी थे.
गणेशजी निकट आए, तो सदानन्दजी ने नहीं लेकिन मैंने और त्रिलोकी ने प्रणाम किया. जवाब में उनका सिर कांपा तक नहीं और आगे बढ़ गए. त्रिलोकी उनके पीछे हो लिया, ”सर, हमारा और आपका मुद्दा आज हर हालत में साफ़ हो जाना चाहिए.”
मैं भी सदानन्दजी को छोड़कर लपका. त्रिलोकी गणेशजी के संग उनके कमरे में घुस गया, तो मैं चिक से सटकर खड़ा हो गया.
”कैसा मुद्दा?” गणेशजी हांफ रहे थे.
”भक्ति-आन्दोलन के सामाजिक कारण क्या थे?”
”उस दिन बताया था. सुना नहीं क्या?” उन्होंने किसी बच्चे की तरह चिढ़कर कहा.
”उस दिन भक्ति-आन्दोलन के सामाजिक कारण बतलाने के नाम पर आप साम्प्रदायिकता फैलाने की कोशिश करते रहे.”
”मैं तुम्हें क्यों बताऊं सामाजिक आधार? तुम तो हिन्दी के छात्र हो नहीं. आउटसाइडर होकर मेरे विभाग में कैसे घुसे?”
त्रिलोकी कुर्सी खिसकाकर खड़ा हो गया. हाथ के पंजों को मेज़ पर रखकर थोड़ा-सा झुक गया, ”भक्ति-आन्दोलन पर हिन्दीवालों का बैनामा है क्या? रही बात आउटसाइडर की, तो जो साले लुच्चे-बदमाश आपके विभाग में आंख सेंकने आते हैं, उनको कभी आपने मना किया? मना किया? आंय? उनको मना करने में आपकी दुप-दुप होती है. मीना बाज़ार बना रखा है हिन्दी डिपार्टमेंट को. महानगरों की सिटी बसें बना रखा है.”
”मैं कहता हूं, निकल जाओ यहां से!”
”तो आप मुझे बाहर निकाल रहे हैं. मैं हिन्दी का विद्यार्थी न होते हुए भी आपको चैलेंज करता हूं कि हिन्दी साहित्य ही नहीं, संसार के साहित्य के किसी मसले पर बहस कर लें. बहस में अगर जीत जाएं तो मैं पेशाब से अपनी मूंछें मुड़ा दूंगा.”
”मैं कहता हूं, निकल जाओ.निकल जाओ.”
”मुझसे निकलने को कह रहे हैं, दुरदुरा रहे हैं, जबकि मैं साहित्य का योग्य अध्येता हूं और गुंडों को आप शेल्टर देते हैं. मैं जा रहा हूं लेकिन जाते-जाते एक बात कह देना चाहता हूं कि क्या कारण है, जब से आप हेड हुए, यहां केवल लड़कियों ने टॉप किया?”
वह तमतमाया हुआ बाहर आ गया. मैंने खुश होकर उसकी पीठ पर हाथ रखा, ”वाह गुरु! मज़ा आ गया. चलो, लल्ला की दुकान पर तुम्हें चाय पिलाता हूं.”
”अबे पहले एक ठो सिगरेट तो पिला.”
”हां.हां.गुरु.लो.”
हम दोनों सिगरेट पी रहे थे. पढ़ने में रुचि रखनेवाले लड़के-लड़कियां हमें मुग्ध भाव से देख रहे थे, लेकिन पास नहीं आ सकते थे, क्योंकि उन नन्हे-मुन्ने प्यारे बच्चों को अच्छे नम्बर लाने थे, जो वे समझते थे कि गणेशजी की लेंड़ी तर किए बिना नहीं मिल सकते थे.
उपमा श्रीवास्तव भी एक कोने में खड़ी होकर हमें देख रही थी. त्रिलोकी मुस्कुराया, ”कहो, कब तक भाभीजी को देवर दिखलाते रहोगे? वैसे उनके बगलवाली मेरी श्रीमती हो सकती हैं.”
”श्री शादीशुदा! सपने देखना छोड़ दो.” मैंने कहा.
”लेनिन के अनुसार सपने हर इनसान को देखने चाहिए.”
”वह तो दिनवाला सपना है, तुम तो रातवाले सपने देख रहे हो.”
”तुम कुंवारे साले स्पप्न-दोष से आगे जा ही नहीं पाते…”
”हा…हा…हा…” मैंने ठहाका लगाया और कहा, ”इस बात का फ़ैसला लल्ला की दुकान पर होगा.”
लल्ला की दुकान पर लड़कों का खूब जमावड़ा होता था, जिसकी ख़ास वजहें थीं. दुकान यूनिवर्सिटी और कई हॉस्टलों के निकट थी. फिर सामने वीमेन्स हॉस्टल था. इसके अलावा लल्ला ने एक हिस्से में जनरल स्टोर्स की भी दुकान खोल ली थी. वीमेन्स हॉस्टल के आसपास में इकलौती अच्छी दुकान थी, सो हमेशा दो-चार लड़कियां ख़रीद-फ़रोख्त करती मिलतीं.
मैं और त्रिलोकी दुकान पर पहुंचे, वहां इलेक्शन की चर्चा थी. हमने चर्चा में शरीक होने के पहले जनरल स्टोर्स की तरफ़ देखा, कुछ लड़कियां और कुछ सामान्य जन सामान ख़रीद रहे थे. त्रिलोकी ने मुझे कोंचा, ”वो पीली साड़ीवाली को देखो.”
मैंने देखा, गोरा रंग और बड़ी-बड़ी आंखोंवाली थी वह. पीली साड़ी ने उसके गोरेपन को चन्दन का रंग बना दिया था. शेम्पू किए चमकते हुए बाल घुंघराले और कटे हुए थे.
मैंने उसे पहले भी कई बार देखा था. वह भेष बदला करती थी. कभी शलवार-कुर्ते में होती तो कभी पैंट-शर्ट में तो कभी स्कर्ट में. उसके कपड़े कभी ढीले होते तो कभी चुस्त. आज पीली साड़ी पहने थी और अलौकिक बाला लग रही थी.
”देख लिया.” मैंने बताया.
”क्या प्रतिक्रिया है?”
”भारत की मोनालिसा.”
”सी…ई…ई…यह पंकज सक्सेना की है. दोनों एक दिन शादी करेंगे और हमें भविष्य भर दावतें देंगे. पंकज की योजना है, नौकरी लगते ही शादी कर लेगा.”
”ईश्वर इसे अखंड सौभाग्यवती बनाए.” मैंने कहा.
हम दोनों आकर दुकान के स्टूल पर बैठ गए. छात्र संघ के चुनाव परिणाम पर चर्चा चल रही थी. इस बार हमारी मंडली जिस संगठन से जुड़ी थी, उसने भी अध्यक्ष पद के लिए प्रत्याशी खड़ा किया था; जिसने अच्छी तरह शिकस्त खाई थी. दरअसल आज़ादी के बाद इस विश्वविद्यालय के छात्र-संघ का इतिहास रहा है कि अध्यक्ष की कुर्सी पर किसी ठाकुर या ब्राह्मण ने ही पादा है और प्रकाशन मन्त्री की कुर्सी कोई हिजड़ा-भड़वा टाइप का ही आदमी गंधवाता रहा है. अध्यक्ष विगत अनेक वर्षों से भारतीय राजनीति के एक धुर कूटनीतिक बहुखंडीजी की उंगलियों और आंखों की संगीत, चित्रकला और भाषा को तत्क्षण समझ लेनेवाला होता रहा है.
इसके मूल में छिपा रहस्य यह है कि बहुखंडीजी पहले इस बात का जायजा लेते हैं कि कौन दो सबसे वरिष्ठ प्रतिद्वन्द्वी हैं. फिर उनका कुबेर दोनों को समृद्ध करता है. इसके बावजूद इस बार हमारा संगठन बहुखंडीजी की मंशा का खंड-खंड करता. बहुखंडीजी ही क्यों, शराब के बड़े ठेकेदार सीताराम बरनवाल, उद्योगपति हािफज, सभी के फ़न को कुचलता हमारा संगठन. सभी की लपलपाती जीभ को सिद्धान्तों के धागे से नापता हमारा संगठन. लेकिन चुनाव की पिछली रात जनेऊ घूम गया. बहुखंडीजी का प्रत्याशी इस बार ब्राह्मण था. मशाल जुलूस निकालने के बाद वह सभी छात्रवासों में गया और अपनी जाति के लोगों की मीटिंग कर पानी भरने की रस्सी जितनी मोटी जनेऊ निकालकर गिड़गिड़ाया, ”जनेऊ की लाज रखो.” और हम हार गए.
हम छात्रसंघ के चुनाव की चर्चा में डूब-उतरा ही रहे थे कि रघुराज हांफता हुआ आया और मुझसे तथा त्रिलोकी से एक साथ बोला, ”छह समोसे खिलाओ.”
हम समझ गए, आज खाना नहीं खाया है उसने. इस समय वह थोड़ा बुझा हुआ भी था कि त्रिलोकी ने उससे पूछा, ”कहां से आ रहे हो महाराज?”
”यार, दो लड़कियों से आरूढ़ रिक्शे के पीछे साइकिल लगाई. रिक्शा सिनेमा हॉल के पास रुका. मैं भी देखने लगा फि़ल्‍म.”
हम समझ गए, अब रघुराज शुरू हो गया है. मैंने पूछा, ”कैसी थी फि़ल्‍म?”
”ठीक ही थी, बस, अश्लीलता का अभाव था.” रघुराज की विशेषता थी कि मूड की स्थिति में संसार के सभी क्रिया-व्यापार के मूल्यांकन के लिए उसके पास इकलौता बंटखरा सेक्स था.
”और लड़कियां कैसी थीं?” त्रिलोकी का प्रश्न था.
”क्षमा करना यार, मैं बताना भूल गया. उसमें एक लड़की थी, दूसरी नव-विवाहिता थी, भाभीजी!”
”पर तुम किसके लिए प्रयासरत थे?”
”दोनों के लिए. बेशक दोनों के लिए, लेकिन ज़्यादा भाभीजी के लिए.”
”लेकिन रघुराज, मैंने प्राय: देखा है कि तुम्हें शादीशुदा औरतें ज़्यादा अच्छी लगती हैं. इसकी वजह क्या है?”
”इसकी वजह, चरम समय पर वे चीं…चीं नहीं करतीं.”
”वाह रघुराज, तुम्हारी पकड़ बहुत अच्छी है. तुमको लेखक होना चाहिए. उपन्यास पर काम करो रघुराज.”
”कर रहा हूं. एक उपन्यास पर काम कर रहा हूं–अतृप्त काम-वासना का जि़न्दा दस्तावेज़. और एक कहानी पूरी की है–इलाहाबाद के तीन लड़कों को देखकर दिल्ली की लड़कियां विद्रोह कर नंगी घर से बाहर.” उसने जोर का ठहाका लगाया, ”साले लेखकों की दुम. आज तक मैंने कुछ लिखा है, जो अब लिखूंगा? फिर आज तक बांझ औरत के कभी सन्तान हुई है? हा… हा…हा…”
रघुराज अब अपनी रौ में था. हमने वहां से उठ लेना ही बेहतर समझा, क्योंकि वहां मंडली से बाहर के कई लड़के थे जिनकी निगाह में हम ब्रह्मचारी किस्म के सरल-सीधे माने जाते थे.
हम उठने लगे तो दूसरे लोगों ने हमें रोका लेकिन हम रुके नहीं. थोड़ी ही दूर बढ़े होंगे कि रघुराज ने अपना काम शुरू कर दिया. आने-जानेवाली प्रत्येक लड़की को वह टकटकी बांधकर देखता. हमने टोका तो कहने लगा, ”कहां क़ायदे से देख पाता हूं. ईश्वर ने एक आंख पीछे भी दी होती, तो कितना आनन्द होता!”
मैंने सलाह दी, ”तुम इसके लिए तपस्या शुरू कर दो.”
”ठीक है.” वह ठिठक गया, ”मैं यहीं धूनी रमाऊंगा.” ठीक सामने वीमेन्स हॉस्टल था. मुझे इसकी यह आदत बिलकुल अच्छी नहीं लगी, ”देखो, तुम वीमेन्स हॉस्टल के बारे में कुछ मत कहना.”
”क्यों?”
”क्योंकि जब सूरज डूब जाता है तो अंधेरे में लड़कियों का यह हॉस्टल मुझे एक अद्भुत रहस्य लोक-सा लगता है…मेरे भीतर इसके लिए एक पवित्र भाव
है.”
”देखो बालक! वैसे मैं तुम्हारे तथाकथित पवित्र बोध को अपवित्र नहीं करना चाहता.” रघुराज गम्भीर हो गया, ”लेकिन अज्ञान की वजह से जन्मी पवित्रता कोई वज़न नहीं रखती इसलिए तुम चाहो, तो मैं तुम्हारी जिज्ञासा को शान्त कर सकता हूं. चाहते हो?”
त्रिलोकी बोल पड़ा, ”हां…हां…महाराज, बताओ.”
”तो सुनो.” वह रुक गया. हम लोगों को पल-भर देखा. फिर धीरे-धीरे चलते हुए कहने लगा, ”मैं कुछ बताने से पहले एक सवाल करना चाहता हूं. बताओ, इस हॉस्टल में पी.एस.एफ. से जुड़ी लड़कियां अधिक क्यों हैं? हमारे संगठन की तरफ़ वे ज़्यादा आकर्षित क्यों नहीं होतीं?”
”तुम ही बताओ महाराज! सब तुम ही बताओ?” त्रिलोकी ने व्यग्र होकर कहा.
”ठीक है, मैं ही बताता हूं. इसलिए कि पी. एस. एफ. भद्र लोगों के वर्चस्ववाली संस्था है. उसमें लड़कियां इसलिए जाती हैं कि उससे जुड़कर उनमें अपने को विशिष्ट समझने का एहसास होता है. देखो, आजकल सम्पन्न घरों के सदस्यों में सामाजिक कार्य करने का चस्का ज़ोर पकड़ता जा रहा है लेकिन उनके ये कार्य मूलत: जनता के संघर्ष की धार को कुन्द करने के लिए होते हैं, यही बिन्दु पी. एस. एफ. और इन सुविधाभोगी लड़कियों के बीच सेतु का काम करता है.”
”रघुराज, हमने तुमसे पी. एस. एफ. और लड़कियों के सम्बन्ध पर प्रकाश डालने के लिए तो प्रार्थना की नहीं थी.” मैंने अधीर होकर कहा.
त्रिलोकी ने भी मेरी बात पर हामी भरी.
रघुराज भड़क गया, ”तुम लोग तभी तो अच्छे लेखक नहीं बन सके.” वह जोर-जोर से बोलने लगा, ”केन्द्रीय तत्त्व को समझे बिना यथार्थ को फैलाने की कोशिश करते हो. यही हड़बड़ीवाली आदत अगर सम्भोग के समय रही, तो शीघ्रपतन के रोगी कहलाओगे और तुम्हारी बीवियां बदचलन हो जाएंगी.”
हमने हाथ जोड़ लिया, ”अच्छा, भइया, सुनाओ! सुनाओ!”
”चलो, क्षमा कर देता हूं. हां, तो मेरी उपरोक्त बात से तत्त्व निकला कि वीमेन्स हॉस्टल की अधिसंख्य लड़कियां आर्थिक दृष्टि से दुरुस्त परिवारों से जुड़ी हैं. लेकिन इससे क्या होता है? यहां भी कई तरह की भिन्नताएं कई तरह की कलहों को जन्म देती हैं. अब बहुत सम्भव है, थानेदार की बिटिया का मनीऑर्डर और जूनियर इंजीनियर की बिटिया का मनीऑर्डर क्रमश: डिप्टी, एस. पी. और असिस्टेंट इंजीनियर की बिटिया के मनीऑर्डर से ज़्यादा रुपयों का होता हो.
ऐसी स्थिति में पहली दोनों को घमंड अपने बाप के पैसों का होगा, दूसरी दोनों को अपने-अपने बाप के पद का. दूसरी तरफ़ हीनता भी अपने बाप के कारण होगी कि एक का बाप पैसा रखते हुए भी मातहत है, दूसरे का बाप अफ़सर होते हुए भी मातहत से कम समृद्ध. लड़कियों के बीच कलह का एक प्रमुख कारण यह है. तुम लोग जानते ही हो, इन लड़कियों में होड़ की भावना बड़ी प्रबल होती है. वे पैटी से लेकर प्रेम तक में अपनी चीज़ को श्रेष्ठ देखना चाहती हैं. कम-से-कम दूसरे से उन्नीस तो नहीं ही देखना चाहती हैं. अब जिनकी माली हैसियत अपेक्षाकृत पिछड़ी होती है, वे गड़बड़-सड़बड़ हो जाती हैं. ऐसे में पहला दम किसी मालदार प्रेमी को पटा लेने का होता है. इसके बावजूद कमी पड़ी तो पतन शुरू हो जाता है.” इतना कहकर रघुराज चुप हो गया. हम भी चुप हो गए.
कुछ देर बाद मैंने कहा, ”और कुछ ज्ञान दोगे?”
”समय क्या है?”
”तीन चालीस.”
”तो त्रिलोकी, तुम भी सुनो, हमें चलना भी है. चार तीस पर जाकर
सांस्कृतिक हस्तमैथुन का विरोध करना है.”
”पर तुमने सांस्कृतिक हस्तमैथुन नाम क्यों दिया?”
”क्योंकि किसी भी स्वस्थ कला के निर्माण के लिए इसकी समाज से प्रतिक्रिया अनिवार्य होती है, पर जिनको तुम लोग आज डंडा करोगे, वे स्वयं रचते, स्वयं आनन्दित होते हैं.”
हम अल्फ्रेड पार्क यहां से आधा घंटा में आसानी से पहुंच सकते थे. यानी कि हमारे पास बीस मिनट का वक्त था पर हमने तय किया कि वहीं चलते हैं. वहां हम धूप का एक टुकड़ा खोजेंगे और बीस मिनट लेटे रहेंगे.
शहीद पार्क से इकट्ठा होकर हमें कलाभवन के लिए कूच करना था. बाकी लोग वहीं मिलनेवाले थे.
मंडली के नेतृत्व में तमाम युवा कलाकार छात्र भवन में हो रहे नाट्य समारोह का विरोध करनेवाले थे. क्योंकि कलाभवन एक सरकारी संस्था थी और इसके कार्यक्रम जनता और उसके अपने कलाकारों से मुंह मोड़े रखते थे. इसमें दर्शक, श्रोता, अफ़सर वगैरह होते और कलाकार विदेशी मेकअप में ऐंठे रहनेवाले. यहां शराब की झमाझम बारिश और रासलीला के प्रयत्न की सुरसुरी समय-असमय हर समय देखी जा सकती थी.
विनोद ने कहीं से कार्यक्रम का पास उपलब्ध कर लिया था. योजना यह थी कि वह हमारे विरोध के पर्चों का बंडल झोले में छुपाकर भीतर हो जाएगा और भीतर जितना बांट सकेगा, बांटेगा, बाकी लोग बाहर नारेबाजी करेंगे. कलाभवन की कमर तोड़ने की अब हम ठान चुके थे.
तो मंडली के लोगों का एक रूप था बौद्धिक, मस्त और निर्भय.
जि़न्दादिली की रोशनाई में डूबी कलमें थे हम.
पर हम और भी कुछ थे. कहीं कुछ बुरा देखें, बुरा सुनें–हम क्रोध से कांपने लगते. इतने अजीब थे हम कि यदि खुद ही गलत कह या कर जाते तो खुद पर ही ख़फ़ा होने लगते. हम पोस्टर चिपकाते. नारे लगाते. हम जुलूसों में होते, सभाओं में होते, हड़तालों में होते. हम पुलिस और गुप्तचरी के रजिस्टर में दज़र् थे. सचमुच हम पढ़ाकू और लड़ाकू थे.
हम गर्म तन्दूर पर पक रही रोटियां थे.
लेकिन हम ऊपर उड़ते गैस-भरे रंग-बिरंगे गुब्बारों की तरह थे. हम उड़ रहे थे.हम उड़ रहे थे. उड़ते-उड़ते हम ऐसे वायुमंडल में पहुंचे जहां हम फूट गए. अब हम नीचे की ओर गिर रहे थे. अपना सन्तुलन खोए हम नीचे की ओर गिर रहे थे. हमारा क्या होगा, हमें पता नहीं था.
हमें नौकरी मिल नहीं रही थी जबकि वह हमारे लिए सांस थी इस वक्त.
उपमा मुझसे उखड़ी-उखड़ी रहने लगी. जब भी मिलती मशविरा देती कि मुझे कम्पटीशन की पढ़ाई और मेहनत से करनी चाहिए. इस पर मैं क्रुद्ध हो जाता. धीरे-धीरे हमारे सम्बन्धों के पांव उखड़ने लगे.
सदानन्दजी भी मंडली से दोस्ताना अन्दाज़ में नहीं मिलते. वह मंडली पर दया करने लगे थे.
अब हम भोजन के लिए लाल-तिकड़म नहीं करते थे. न होने पर भूखे रह जाते. उधार लेने का मनोबल भी खो चुके थे हम.
कोई हमसे पूछता, क्या कर रहे हो? तो प्रत्युत्तर में हम कांपने लगते. किसी से मिलने के पहले ही हमारे दिल की धड़कन तेज़ हो जाती, कहीं पूछ न लिया जाए, क्या कर रहा हूं मैं?
आपस में भी मिलना कम होने लगा. हम परस्पर कतराने लगे. हमारे बीच मुहब्बत बदस्तूर थी पर बातचीत में हम थोड़ा कटखने हो गए थे. एक बार हम लोग छुट्टियों में अपने-अपने घर गए. लौटने पर हम सभी थके और हारे हुए लग रहे थे. हमने अपने माता-पिता-परिचितों को निराश किया था जिससे वे चिढ़ गए थे. उन्होंने हमें हिकारत से देखा था और हम हार गए थे. थक गए थे.
फिर भी हमने तय किया था कि हम घर चले जाएंगे. हम कुटिया पर इकट्ठा होनेवाले थे–अपने-अपने घरों को प्रस्थान करने के लिए.
हम खुशी या फ़ायदे के लिए नहीं वापस हो रहे थे. हम मजबूर थे, क्योंकि यहां तो जीना मुहाल हो गया था. गुज़ारा मुश्किल था.
बाद की कहानी यह कि हम कुटिया पर इकट्ठा हो गए थे. विनोद का यह कमरा आधुनिक शैली का था पर उसकी जीवन-पद्धति ने इस आधुनिकता का कबाड़ा कर दिया था. किताबें और कपड़े हर जगह फैले हुए थे. उसने हर जगह रंगीन तसवीरें चिपका रखी थीं. चेग्वारा की बगल में एक सुन्दरी कूल्हे मटका रही थी…
सबसे पहले त्रिलोकी बहका. वह हाथों में शराब का गिलास लेकर खड़ा हो गया और बोला, ”भाइयो और बहनो!”
”नेताजी, यहां कोई लौंड़िया नहीं है.” प्रदीप चिल्लाया. वह भी हलके, बहुत हलके सुरूर में आ गया था.
”बड़े अफ़सोस की बात है.” त्रिलोकी दुखी होकर बोला, ”यह भारतवर्ष के लिए बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि हम जैसे महान युवकों के पास न प्रेमिकाएं हैं और न नौकरियां. हम किसके सहारे जिएं?”
”मैं जानता हूं. जानता हूं .लो मैं बैठ जाता हूं .पब्लिक साली अब समझदार हो गई है. सवाल-जवाब करने लगी है.”
”सवाल-जवाब ही तो नहीं कर रही है जनता, वर्ना हमारी यह दशा नहीं होती. नहीं होती.” दीनानाथ ने धीमे से अपने से ही कहा.
त्रिलोकी को छोड़कर बाकी मंडली अभी नशे में नहीं थी. नशे की पूर्वावस्था सुरूर में थी.
”आखि़रहम यहां क्यों इकट्ठा हुए हैं?” मदन मिश्र दार्शनिक अन्दाज़ से बोला.
मैंने कहा, ”यहां हम विदाई-समारोह के उपलक्ष्य में एकत्र हुए हैं.”
”नहीं.” प्रदीप ने बताया, ”यह बैठक हमारे सुख की शोकसभा है. हमारे पास जो भी सुख था, इस बैठक के पहले ख़तम हो गया. कल से हम दुखी दुनिया के दुखी नागरिक होंगे.”
”हम नागरिक नहीं हैं. दुखी दुनिया के नागरिक मज़दूर और किसान होते हैं, जिनके श्रम का शोषण होता है. हमारे पास तो सामाजिक श्रम करने का भी अधिकार नहीं है.” त्रिलोकी तैश में आ गया था, ”जिसके पास कोई काम नहीं होता, वह आदमी नहीं होता. हम आदमी नहीं हैं. इस व्यवस्था ने हमें आदमी नहीं रहने दिया. हमसे हमारा होना छीन लिया गया.” त्रिलोकी सुबकने
लगा. वह सिर झुकाए सुबक रहा था.
जैसे काठ मार गया हो, हम सब स्तब्ध हो गए. इस बात को कृष्णमणि ने सबसे पहले भांपा. वह आहिस्ते से त्रिलोकी के पास गया और उसके लटके हुए मुंह से एक सिगरेट लटका दी, ”नेताजी, ईश्वर एक दिन तुम्हारी सुनेगा ज़रूर. तुम इसी तरह भाषण करो लेकिन भाषण के बाद असल में सुबकना छोड़ दो तो एक दिन सच्ची-मुच्ची में नेता हो जाओगे और मौज करोगे.”
”हम एक दिन मर जाएंगे, और कोई जानेगा भी नहीं.”
विनोद मेज़बानी भूला नहीं, ”आप लोगों में जिसके गिलास खाली न हों, कृपया उन्हें जल्द खाली कर लें. यह साकी जाम का दूसरा पैग ढालने के लिए उतावला है.”
”काश, आज हम किसी रूपसी के हाथ पीते तो रात कितनी हसीन होती!’ रघुराज था.
”मार साले को.” हमने चौंककर देखा, प्रदीप था. उसे भी चढ़ गई थी. उसने फिर कहा, ”मार साले को.’ और चुप हो गया.
मैंने पूछा, ”किसे मार रहे हो?”
”अपने दोस्तों के लिए नहीं कह रहा हूं. बस, मार साले को.’
हम दूसरा पैग पीने लगे. रात और ठंड दोनों बढ़ गई थी. दीनानाथ ने उठकर खिड़कियां बन्द कर दीं. हमने सिगरेट सुलगा लीं. उनका धुआं कमरे में घुमड़ने लगा. मदन ने घूंट लेकर सिगरेट पी और कहा, ”रोज़ मेरी मृत्यु होती है. रोज़ कई-कई बार मेरी मृत्यु होती है. कोई मुझसे पूछता है, ‘तुम क्या करते हो? और मैं मर जाता हूं.”
”मार साले को.’ प्रदीप धुत् होने के करीब पहुंच गया था. वह किसे मारना चाहता था?
”तुम लोग समझते होगे, मैं नशे में हूं लेकिन मैं होशोहवास में कह रहा हूं. बेरोज़गारी के कारण मैं कई-कई बार रोया हूं. पिछली बार का रक्षाबन्धन था. बहन को देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था. भाई उसके लिए कपड़े ले आए थे. मेरे पास कुछ नहीं था. बहन ने मेरे सिरहाने की किताब में चुपके से सौ का नोट रख दिया. उसे पॉकेट में रख खूब रोया. मैंने उसे कुछ नहीं दिया. वह नोट अब भी मेरी डायरी में रखा है. मैं उसे देखता हूं और उदास हो जाता हूं.” कृष्णमणि अपने चेहरे पर हाथ फेरने लगा.
”मां-बाप दो आंखें नहीं करते–यह झूठ है.” विनोद ने एक सांस में कह डाला, ”मेरे मां-बाप मेरे कमासुत भाई की चापलूसी तक करते हैं पर मुझे देखकर जल-भुन जाते हैं.’
”और मैं. मेरा पिता से कोई संवाद नहीं. एक दिन उन्होंने गुस्से में चीख़कर कहा, ‘लोग पूछते हैं कि तुम्हारा बेटा क्या करता है? मैं क्या बताऊं उन्हें? बोल. जवाब दो. बोल. बस, इसी दिन से हम एक-दूसरे से नहीं बोले.’
दीनानाथ आंखें स्थिर कर कुछ सोचने लगा. कहीं खो गया था वह.
”लो, मैं भी बता देता हूं.’ रघुराज ने अपना सिर उठाया, उसकी आंखें सुर्ख लाल थीं, ”मैं अपना रहस्य खोलता हूं. अब हम जा रहे हैं, तो क्या छिपाना. मैं लड़कियों के पीछे कभी नहीं भागा. मैं एक कपड़े की और एक दवा की दुकान पर पार्ट टाइम काम करता रहा. मालिक मुझे ढाई सौ रुपए का चाकर समझते रहे. मैं…मैं…’ वह चुप हो गया, उसकी आवाज़ फंसने लगी थी.
मंडली अवाक् थी रघुराज की बात से. रघुराज ने अपना चेहरा फिर घुटनों में छिपा लिया.
हम सभी ने अपनी रामकहानी कही. हमने तीसरा पैग लिया. हमने चौथा पैग पिया. पांचवां पिया. हम लुढ़कने लगे.
विनोद ने कहा, ”हम खाना कैसे खाएंगे?’
”भविष्य में हमें भूखे रहना है, हम आज भी भूखे रहेंगे.’ मदन डांवांडोल होते हुए उठ खड़ा हुआ. हम सभी खड़े हो गए.
हम कुटिया के बाहर खड़े थे, अलग-अलग दिशाओं की तरफ़ जाने के लिए. रात गाढ़ी थी और हवा सरसरा रही थी. हमारे मुंह बन्द और चेहरे भिंचे हुए थे.
”अच्छा, दोस्तो!’ रघुराज ने गला साफ़ करते हुए दुबारा कहा, ”अच्छा, दोस्तो! अब विदा होते हैं.’ एक क्षण सन्नाटा रहा फिर अचानक हम सब लोग जोर से रो पड़े. हम सारे दोस्त फूट-फूटकर रो रहे थे. उस दिन अलग होने के पहले हमने तय किया, ”हममें से यदि कोई कभी सुखी हुआ तो सारे दोस्तों को ख़त लिखेगा.” लम्बा समय बीत गया इन्तज़ार करते, किसी दोस्त की चिट्ठी नहीं आई. मैंने भी दोस्तों को कोई चिट्ठी नहीं लिखी है.

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