Friday, 27 May 2016

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते - प्रचण्ड प्रवीर

नन्हे बहुत छोटा था. उसकी एक बड़ी दीदी थी. दीदी बहुत बड़ी थी, मां से लंबी और पापा से छोटी. नन्हे दीदी की कमर तक आता था. दीदी आठवीं में पढ़ती थी, नन्हे तीसरी में पढ़ता था. नन्हे को स्कूल जाना कभी पसंद नहीं था, लेकिन दीदी हमेशा स्कूल जाती थी. नन्हे बिचारा स्कूल में हमेशा या तो फेल करता था या फिर किसी तरह पास कर दिया जाता था. स्कूल की गाड़ी में लदे-लदे वापस घर आ जाता था. घर में मां काम कर रही होती, या सो रही होती. उसे लगता कि बड़े होने में कितना आराम है, आराम से घर में बैठने को मिलता है. पापा अपने मन से सोते हैं, उनको कोई पढने को नहीं कहता. दीदी को पढने में पता नहीं क्या मज़ा आता था.
आज दीदी पढ़ रही थी.
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता.
यत्रास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला क्रिया:..
ये कहानी प्रचंड प्रवीर की किताब जाना नहीं दिल से दूर से ली गई है, प्रकाशक Harper Hindi हैं.
अर्थात् जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता बसते हैं, और जहां पूजा नहीं होती है वहां पे सारे काम बेकार हो जाते हैं.”
दीदी बार-बार दोहरा रही थी. नन्हे ने मां से जा के अर्थात् का मतलब पूछा. मां ने बताया कि अर्थात् का मतलब मतलब होता है. नन्हे को समझ में ही नहीं आया, ये क्या मतलब है. लेकिन डर के मारे उसने कुछ पूछा नहीं. आखिरी बार उसने आश्चर्य का मतलब पूछा था, लाख बताने पे भी समझ नहीं आया. कुछ होता होगा. लेकिन एक बात नन्हे को समझ में आ गयी कि नारी की पूजा होती है. नन्हे ने ग़ौर किया, तो देखा कि दुर्गा जी, काली जी, सरस्वती जी, लक्ष्मी जी सब की पूजा होती है. लेकिन आदमी भगवान कितने कम हैं. एक गणेश जी है लेकिन वो तो हाथी जैसे हैं. आदमियों की कोई पूछ नहीं.
सच में, आदमियों की कोई पूछ ही नहीं होती. क्लास में किशमिश को टीचर कितना मानती है, और उसको हमेशा डांट सुननी पड़ती है. किशमिश कितनी सुंदर है. मां कितनी सुंदर है, दीदी कितनी सुंदर है, और नन्हे है जो हमेशा गन्दा रहता है. कभी धूल में गिर पड़ता है तो कभी मैदान में चोट लग जाती है. कपड़े हमेशा गंदे हो जाते हैं. मामा जी आते हैं तो दीदी को कितना प्यार करते हैं, कितनी टॉफी देते हैं. नन्हे को सब की बात सुननी पड़ती है. दूध नहीं पीता है, क्लास में फेल कर जाता है, पता नहीं बड़ा हो के क्या बनेगा. नन्हे रिक्शा चलाएगा. दीदी और मां सब उसके रिक्शा पे घूमेंगे. नन्हे मां से पैसा नहीं लेगा, ये सुन के लोग हंसते हैं और फ़िर बाद में मारते भी हैं. किसलिए?
लडकी होने के कितने आराम हैं, शादी कर लो और घर में बैठो. दीदी पढ़ रही है.
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता.”
दीदी मां से बोल रही है, “मां, मेरा डिबेट है. और कुछ बात बताओ? नारियों की महत्ता पर कुछ बोलना है. ये साल बालिका वर्ष है. बोलो न.”
नन्हे मां के पास पहुंच गया, “मां, डिबेट क्या होता है?”
“वाद-विवाद”, मां ने कहा.
“मतलब?” नन्हे को नहीं समझ में आया.
“तुम चुप रहो, बस घड़ी-घड़ी पहुंच जाते हो. शब्दकोष है न! जाओ देखो.” दीदी कस के चिल्लाती है.
नन्हे चुप से बाहर चला आता है. मां बोल रही थी, “पापा से पूछना. तुम वो श्लोक और डाल सकती हो….”
नन्हे को डांटा तो कोई कुछ नहीं बोलता है. नन्हे की दोस्त थी, प्रीति. उसको सब बहुत मानते थे. उसके पापा रोज़ उसको टॉफी देते थे, भले ही वो हर बार फेल कर जाती थी. लड़का होना ही ग़लत बात है.
पापा शाम में आ गए. नन्हे पापा से जा कर पूछता है, “पापा, नारी महान होती है?”
पापा ने कहना शुरू किया, “जगत जननी होती है. शक्ति का रूप होती हैं. उनका आदर करना चाहिए. तुम मां को कभी तंग मत किया करो, दीदी को भी नहीं. अच्छे से पढो और कपड़े मत गंदे किया करो इतना.”
नन्हे क्या पूछे, “जगद जननी का मतलब क्या होता है?”
नन्हे कमरे में आ कर गुमसुम बैठ गया. “छी, वो लड़का क्यों हुआ? भगवान ने कितना बड़ा धोखा दिया है उसे? न वो सुंदर है, न ही पूजने लायक. अब क्या किया जा सकता है.” नन्हे की रुलाई छूट गयी. नन्हे पहले सिसकने लगा. लेकिन कोने में कोई उसे देख ही नहीं रहा था. अगर दीदी रोती तो सब दौड़ के देखने आते. लड़के होने पे कोई रोना भी नहीं देखता. नन्हे से बर्दाश्त नहीं हुआ, और वो ज़ोर ज़ोर से रोने लगा.
“बु हू हू हू…. आं आ आं या ऊऊं … हु हु. ”
घर ने हड़कंप मच गया.
“क्या हुआ? किसने काट लिया? सांप है क्या?” पापा दौड़ते हुए आए.
“क्या हुआ, क्या हुआ? पिंकी तुमने नन्हे को मारा है क्या?” मां किचन से भागी हुई आई.
“नहीं मां. मैं तो डिबेट के लिए पढ़ रही हूं. क्या हुआ नन्हे को?” पिंकी दीदी भी आयी.
“क्या हुआ नन्हे? बोलो?” पापा ने पूछा.
नन्हे नहीं बोलेगा. सब सोचते रहो, नहीं बताया जायेगा.
“क्या हुआ?” मां ने पूछा. नन्हे और जोर से रोने लगा.
“क्या हुआ रोंदु? क्यों गला फाड़ रहा है?” पिंकी दीदी ने पूछा.
“तुम चुप रहो. जब देखो तब इसको तंग करती हो. तुम ने ही कुछ किया होगा.” पापा ने पिंकी दीदी को थप्पड़ दिखाया. पिंकी दीदी इशारा समझ के चली गयी.
“नन्हे कुछ बोलो?” मां ने पूछा. फ़िर थोडी देर में वो सब समझ गयी जैसे. “अच्छा तुम बैठो, खाना परोस के तुम्हारे पास आती हूं.”
नन्हे चुप हो गया. मां कभी धोखा नहीं देती.
खाना खाने के बाद मां नन्हे के पास आ कर बिछावन पर लेट गयी.
“क्या हुआ? तुम क्यों रो रहे थे?” मां ने पूछा.
नन्हे थोड़े धीरे बोला, ” मां, मैं लड़का क्यों पैदा हुआ?”
“क्यों?”
“लड़की होना कितनी बड़ी बात है. है ना?” नन्हे ने धीमे से टुकुर टुकुर ताकते हुआ कहा.
मां हंसने लगी. “ऐसा कुछ नहीं है. कौन कह दिया. अरे देखो कितने बड़े लोग सब, सब लड़के ही तो होते हैं.” फ़िर मां की आवाज़ थम सी गयी. पता नहीं कहां सोचने लगी थी, “मेरा राजा बेटा, तू बड़ा हो कर राज करेगा. लड़के ही तो सब कुछ करते हैं.” मां की आवाज़ कैसी धीमी- घुटी सी हो गयी. मां जल्दी-जल्दी नन्हे को हलकी-हलकी थपकियां देने लगी. कहीं और देख रही थी.
नन्हे को समझ में ही नहीं आया कि क्या हुआ. “मां, जगद जननी मतलब?”
“सब को पैदा करने वाली…” मां ने कहा.
नन्हे को नहीं समझ में आया. नन्हे ने फ़िर से पूछा, ” मां, अर्थात् का मतलब…”
मां ने कुछ नहीं कहा. फ़िर नन्हे को देखा, और कहा,” अभी सो जाओ. कल बताऊंगी.”
नन्हे ने आंखें मूंदी और गहरी नींद में खो गया.
प्रचण्ड प्रवीर आईआईटी से थे. उनने सबसे पहले किताब लिखी. ‘अल्पाहारी गृहत्यागी’ फिर ‘ अभिनव सिनेमा’ . ‘जाना नहीं दिल से दूर’ उनकी तीसरी किताब है. उसी किताब की एक कहानी आपने ऊपर पढ़ी. ये किताब अमेजन पर उपलब्ध है. प्रीबुकिंग के लिए यहां जाएं. http://amzn.to/1TkazJu​
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